हैरत

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टीवी का महाभारत

Posted On 3 May, 2016 Junction Forum, Social Issues में

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दिल्ली के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में घटित एक घटनाक्रम के बाद भारतीय टीवी समाज स्पष्ट रूप से दो खेमों में बंटा नजर आया। इसमें कोई संदेह नही था कि जो भी कुछ घटा वो दुर्भाग्यपूर्ण था लेकिन इस घटना के बाद टीवी जगत के इस बंटवारे ने मेरे मन में ये सवाल पैदा किया कि क्या टीवी मीडिया का ये रवैया देशहित में है। जब अलग-अलग चैनलों ने इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया तो ये मुद्दा सभी देशवासियों के लिए जिज्ञासा के साथ सामने आया। चूँकि टीवी का प्रभाव देश के अच्छे खासे हिस्से पर होता है तो हर चैनेल की राय देश के नागरिकों के मस्तिष्क पर असर करती है। इस मामले में भी यही हुआ। देश में इस मुद्दे पर एक व्यापक बहस छिड़ गयी जिसमें टीवी का योगदान सर्वोच्च था। अख़बार, पत्रिकाओं ने भी इसे कवर किया लेकिन उनकी भूमिका केवल सूचना देने तक सीमित रहा। पत्रकारिता के दृष्टि से यह ठीक भी था। लेकिन इसी बीच भारत के टीवी बिरादरी की भूमिका अलग स्वरूप में हमारे सामने थी।

इस दौरान देश के शीर्ष 10 में शामिल 4-5 टीवी चैनेलों का पूरा ध्यान केवल इसी मुद्दे पर था। मामले की संजीदगी को देखते हुए इसमें कोई बुराई भी न थी। टाइम्स नाउ, ज़ी, एनडीटीवी, ए बी पी और आजतक जैसे न्यूज़ चैनेल इस प्रकरण को लेकर प्रमुख रूप से सामने आये। इनमे से कुछ पक्ष तो कुछ प्रखर रूप से विपक्ष में थे। जबकि कुछ ने हमेशा की तरह तठस्थ पत्रकारिता को भी स्थान दिया। ये बिखराव ही हमारी चिंता है। आखिर ऐसा क्या हुआ जो पत्रकारिता के मूल्यों से ऊपर था। थोड़ी बहुत असहमति तो कोई भी समझ सकता है लेकिन यदि किसी दुश्मनों की भांति व्यवहार समाने हो तो सवाल पैदा होते हैं। दुश्मनी भी ऐसी कि जिसे देख कर दर्शकों को सास बहू के नाटक की भी जरूरत न पड़े। ऐसी स्थिति में ये जानना जरूरी हो गया कि आखिर ऐसा क्या है जो इसका मूल कारण है। क्योंकि ये एक ऐसा मुद्दा था जो सीधे तौर पर हमारे देश की अखंडता को चुनौती दे रहा था। जेएनयू में हुए कथित देश विरोधी घटनाक्रम के बाद यदि इस संवेदनशील मुद्दे को इतनी असंवेदनशील तरीके से प्रचारित किया जायेगा तो शायद यह सही नही होगा।

अब आते हैं इन विभिन्न प्रकार के बिखराव के बाद पैदा हुए दर्शकों की राय की तरफ तो हम पाएंगे कि इसमें भी दर्शकों की राय भी अलग अलग है। हमारा भारतीय समाज आज भी उतना विवेकशील नही है जितना किसी विकसित राष्ट्र के लोग होते हैं। निश्चित तौर पर वहां भी लोग प्रभावित होते हैं लेकिन वहां के लोकतान्त्रिक ढांचे में इतनी मजबूती है कि वो ऐसे झटके सह सके। हमारा तन्त्र अभी भी सुधार की प्रक्रिया में है। जब देश में पहले से ही कश्मीर, पूर्वोत्तर और नक्सल जैसी समस्याएँ स्थायी रूप से जगह बना चुकी हों और इनको खत्म करने के प्रयासों में राष्ट्र की अधिकतम उर्जा भी लग रही हो तब ऐसी चीजें और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। एक सहिष्णु और उदार देश होने के नाते भारत में सभी प्रकार की सम्भावनाएं हमेशा जिंदा रहती हैं। और इन्ही के बीच अगर मीडिया भी किसी भी प्रोपेगंडा के तहत काम करना शुरू कर दे तो यह देश के लिए कहीं से भी हितकारी नही होगा। दक्षिणपंथ और वामपंथ देश की राजनीति का हिस्सा हो सकते हैं लेकिन इसी पेशे में यदि मीडिया आ जाये तो ये कहीं से भी उनकी निजी स्वतन्त्रता का पहलू नही हो सकता। आप अपनी सोच व्यक्तिगत रूप से रख सकते है ये हर किसी का अधिकार भी है लेकिन इसी सोच का प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर के सार्वजनिक प्लेटफार्म से किया जाये तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

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